Vande Bharat Train रेलवे ने क्यों छुपाई वंदे भारत ट्रेन की यह बातें? 

Published By :  Pravesh Gautam

Jun 30,2024 | 12:02:pm IST |  8510

प्रवेश गौतम, ( करंट स्टोरी, भोपाल)। भाजपा या यूं कहें तत्कालीन मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में से एक है, वंदे भारत ट्रेन। कहने को मोदी से लेकर मंडल अध्यक्ष तक वंदे भारत की  तारीफ करते हैं। पर हकीकत इससे काफी अलग है। जैसे इस ट्रेन के संचालन हेतु भारतीय रेलवे या कहें रेल मंत्रालय ने कई तकनीकी पहलुओं को या तो छिपाया है या फिर झूठ बोला है। वंदे भारत को भारत की सर्वाधिक तेज गति से चलने वाली ट्रेन का तमगा देना बेमानी है, क्योंकि अभी भी इसकी औसत गति 90 किलोमीटर प्रति घंटा भी नहीं छू पा रही है। आज हम बताएंगे की कैसे बुनियादी जरूरतों को दरकिनार करके वंदे भारत ट्रेन का संचालन किया जा रहा है। 

सबसे पहले बता दें की जब भी किसी नई ट्रेन का संचालन शुरू किया जाता है, तब उसके लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स और अतिरिक्त रैक की व्यवस्था पहले की जाती है। जैसे नई कार खरीदने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है की जरूरी स्पेयर पार्ट्स और सर्विस सेंटर का नेटवर्क कितना सुदृढ़ है। पर वंदे भारत ट्रेन चलाने से पहले इसी पहलू को दरकिनार किया गया।

इसके कारण जब भी वंदे भारत ट्रेन के कोच में कोई तकनीकी समस्या आई तो दूसरी ट्रेन के कोच यानी डब्बे लगाकर वंदे भारत ट्रेन चलाई गई। उदाहरण है नई दिल्ली से वाराणसी चलने वाली वंदे भारत ट्रेन में तेजस एक्सप्रेस के कोच लगाकर चलाया गया। रेलवे ने तब तकनीकी समस्या कारण बताया था। सूत्रों ने बताया की वो समस्या काफी बड़ी थी जिसे ठीक करने मे समय लग गया था। ऐसा ही नागपुर से बिलासपुर चलने वाली वंदे भारत ट्रेन में हुआ था। 

आपको बता दें की ECR ने इसी समस्या का उल्लेख करके वंदे भारत ट्रेन के अतिरिक्त रैक की मांग की थी। किसको रेलवे बोर्ड ने मंजूर किया था। और बाद ने एक अतिरिक्त रैक दिया गया था। पर अभी कई जोन हैं जिनके पास इसके अतिरिक्त रैक नही हैं जैसे पश्चिम मध्य रेलवे।

दरअसल राजनीतिक लाभ के कारण इस ट्रेन को जल्दबाजी में शुरू किया गया। रेलवे से जुड़े सूत्र बताते हैं की जब पहली वंदे भारत ट्रेन चली थी, तक इसमें कई खामियां सामने आई थी। और इस ट्रेन में वंदे भारत ट्रेन बनाने वाली कंपनी के इंजीनियर का पूरा एक दल चलता था। यदि कोई समस्या आती थी तो वहीं ऑन स्पॉट उसको जुगाड़ करके ठीक किया जाता था। इस वक्त वंदे भारत में तेजस के कोच लगाने का एक कारण यह भी है की वंदे भारत ट्रेन के अतिरिक्त रैक नही दिए गए थे। मतलब यदि किसी जोन से चलने वाली वंदे भारत ट्रेन के डब्बों में कोई बड़ी तकनीकी खामी आ जाए तो इस ट्रेन को बंद करना पड़ेगा क्योंकि रैक उपलब्ध नहीं है। जैसा नागपुर बिलासपुर वंदे भारत ट्रेन के मामले में हुआ। पश्चिम मध्य रेलवे में भी कमोवेश यही स्थिति है। 

कुछ महीने पहले ही पूर्वोत्तर रेलवे ने अतिरिक्त रैक की मांग की थी। जो हाल ही में पूरी की गई है। 

अब दूसरी बड़ी समस्या यह है की इसके संचालन में इतना दबाव है की रात के वक्त कम समय में इसका रूटिन मेंटेनेंस भी नही हो सकता। रानी कमलापति से नई दिल्ली चलने वाली वंदे भारत ट्रेन रात में लगभग 1 बजे तक पिट लाइन में लगती है। जिसके बाद सुबह 4.30 बजे तक इसे दोबारा तैयार करके प्लेटफॉर्म में लगाना होता है। मतलब रात में लगभग 4 घंटे ही मिलते हैं जांच के लिए। ऐसे में बड़ी समस्या आने पर ट्रेन को शॉर्टकट तरीके से जुगाड़ करके चलाए जाने की संभावना प्रतीत होती है। क्योंकि पीट लाइन में मौजूद स्टाफ और इंजीनियरों के पास न तो पर्याप्त स्पेयर पार्ट्स हैं और न ही इन्हें कई पार्ट्स को खोलने या सुधारने की इजाजत है। जैसे बैटरी बॉक्स को रेलवे के इंजीनियर नहीं खोल सकते। इसको खोलने का अधिकार के कंपनी के लोगों को है।

गौरतलब है की रानी कंपलापति से दिल्ली और रीवा से रानी कंपलापति स्टेशन के बीच चलने वाली वंदे भारत ट्रेन के बैटरी बॉक्स में आग लगने की घटना हुई थी। सूत्रों के अनुसार, बैटरी बॉक्स को रेलवे के इंजीनियर खोल भी नही सकते। और यदि इसमें कोई गड़बड़ी हो तो वह पता भी नही चलता। सूत्र बताते हैं की इसमें पहले कोई सेंसर भी नही लगा था। यानी बैटरी में कोई समस्या आ जाए, आज लग जाए या हीट होने लगे तो पता केबिन में ड्राइवर को कोई अलर्ट नही जाता था। हालांकि आग लगने की घटना के बाद अब सेंसर लगा दिया गया है। 

सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार, पत्थर बाजी के कारण वंदे भारत ट्रेन में कांच टूटने की समस्या है। अब टूटे हुए कांच या यूं कहें की दरार वाले कांच भी एक रात के मेंटेनेंस में नहीं बदला जा सकता। क्योंकि यह बाहर से लगे हुए हैं। और इसको चिपकाने के लिए सिलिकॉन का उपयोग होता है। और इसके सूखने में कम से कम 24 घंटे लगते हैं। पर ट्रेन बनाने वाली कंपनी ने हाई स्पीड सिलिकॉन उपलब्ध करवाया है। जो 6 घंटे में सूख जाता है। पर यह भी एक रात के समय में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके लिए उस दिन का इंतजार करना होता है जिस दिन वंदे भारत ट्रेन की छुट्टी होती है। यानी हफ्ते  में एक दिन यह ट्रेन नही चलती। इस दिन कांच बदले जाते है। पर यहां भी समस्या है। सूत्र आगे बताते हैं की जितनी आवश्यकता है उतने स्पेयर पार्ट्स भी उपलब्ध नहीं रहते। 

वंदे भारत ट्रेन को जल्दी बनाने का दबाव था। इसलिए इसमें कई तकनीकी पहलुओं को पूरा करने का समय नहीं मिला। ज्यादा ट्रेन चलाने के लिए 16 कोच वाली वंदे भारत ट्रेन को 8 कोच करके एक ट्रेन से दो ट्रेन बना दी गई। 

सूत्र यह भी बताते हैं की आइसीएफ द्वारा वंदे भारत ट्रेन के प्रोटोटाइप बनाने वाली कंपनी के इंजीनियर हर स्टेशन की पीट लाइन पर मौजूद रहते हैं। इस ट्रेन को चले लगभग 4 साल हो गए है। बावजूद इसके रेलवे द्वारा जरूरी आवश्यकताओं की संपूर्ण पूर्ति नहीं की जा सकी है। 

एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सूत्र बताते हैं की पहली ट्रेन के चलने के दिन से आज तक कई संरक्षा से जुड़ी कमियां सामने आ रहीं हैं। जबकि होना यह चाहिए था की इसमें तकनीकी उन्नयन हों जाना चाहिए था। पर ऐसा नही हुआ। इसका प्रमुख कारण है जल्दबाजी में बनाई गई ट्रेन। 

रेलवे से सीआरएस मंजूरी एवं इसके संरक्षा मानकों से संबंधित सर्टिफिकेट के बारे में आरटीआई के माध्यम से जानकारी चाही गई है। पर अभी तक रेलवे ने इसका जवाब नही दिया है। जिससे मामला थोड़ा संदेहास्पद हो जाता है। इसके अलावा पश्चिम मध्य रेलवे के मुख्य जन संपर्क अधिकारी हर्षित श्रीवास्तव से भी सवाल किए गए थे, परंतु अभी तक कोई जवाब नही आया है।

खैर सच्चाई जो भी हो, पर रेलवे की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

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