विंध्य में कमजोर होते अजय सिंह, कैसे बढ़ेगा कद?

Published By :  Pravesh Gautam

Dec 15,2018 | 07:35:48 am IST |  9788

प्रवेश गौतम, भोपाल। हाल ​ही में मप्र में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में नतीजे तो आए पर पार्टी के कद्दावर नेता कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' की हार ने सबको चौंकाया भी दिया। पिछले 20 सालों से लगातार चुरहट विधानसभा सीट से विधायक रहे अजय सिंह प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष भी रहे। उन​की हार से समर्थकों में निराशा है तो वहीं कई कांग्रेसी विधायक अजय सिंह के लिए अपनी सीट छोड़ने की मंशा भी जाहिर कर चुके हैं।

पर सवाल उठता है कि आखिर अजय सिंह को हार का सामना क्यों करना पड़ा? वहीं विंध्य में कांग्रेस के कई प्रत्याशियों को भी हार का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि विंध्य क्षेत्र की 30 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी के चयन पर अजय सिंह की अहम भूमिका रही। कांग्रेस का मजबूत गढ़ माने जाने वाले विंध्य क्षेत्र में इस बार कांग्रेस को 6 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। जबकि भाजपा को 8 सीटों का फायदा हुआ।

राजनीतिक विश्लेष्कों का मानना है कि अजय सिंह की पकड़ विंध्य क्षेत्र में कमजोर होती जा रही है। इसी का नतीजा है कि उनकी सिफारिश पर टिकट पाए प्रत्याशी हार गए। रीवा जिले में तो कांग्रेस लगभग गायब ही हो गई। सतना जिले में भी विधानसभा उपाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह सहित कई दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। सीधी और शहडोल में भी कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। तो क्या इन नतीजों से यह निष्कर्ष निकलता है कि अजय सिंह विंध्य की जनता का मन टटोलने में नाकामयाब हुए, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। सवाल बड़ा है किन्तु विचारणीय अवश्य है।

अजय सिंह की हार भी प्रदेश के राजनितिक इतिहास में प्रमुख घटना के रूप में दर्ज हो चुकी है। उनको लगभग 7000 वोटों से हराने वाले भाजपा के प्रत्याशी शरदेन्दु तिवारी के दादाजी  स्व. श्री चन्द्र प्रताप तिवारी ने अजय सिंह के पिता एवं पूर्व मुख्यमंत्री स्व. श्री अर्जुन सिंह को भी चुरहट से हराया था। शरदेन्दु तिवारी ने अपने दादाजी की तरह ही काम किया और क्षेत्र में आमजन के बीच लगातर सक्रिय रहकर उनकी समस्यों का समाधान भी किया। चुरहट में विकास कहीं दिखाई भी नहीं दे रहा था, जबकि अजय सिं​ह 20 सालों से वहां के विधायक रहे।

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी में उनके समर्थक लगातार उन्हें पार्टी में बड़ा पद दिए जाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन पार्टी यदि कमजोर होते नेता को विंध्य की कमान देगी तो इसका असर आगामी लोकसभा चुनावों में भी पड़ सकता है।

 

 

 

 

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